Bright star, would I were stedfast as thou art—
Not in lone splendour hung aloft the night
And watching, with eternal lids apart,
Like nature's patient, sleepless Eremite,
Bright star, would I were stedfast as thou art—
Not in lone splendour hung aloft the night
And watching, with eternal lids apart,
Like nature's patient, sleepless Eremite,
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आयी फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की क़ीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन 'छबीली' थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाजी की गाथाएँ
उसको याद ज़बानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना ख़ूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी
भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आयी लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई ख़ुशियाँ छायीं झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया,
शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छायी,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लायी,
तीर चलानेवाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भायीं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आयी,
निःसंतान मरे राजाजी
रानी शोक-समानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फ़ौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा
झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अनुनय विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे अब तो पलट गयी काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया,
रानी दासी बनी, बनी यह
दासी अब महरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात,
क़ैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात,
बंगाले, मद्रास आदि की
भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
रानी रोयीं रनिवासों में बेगम ग़म से थीं बेज़ार
उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अख़बार,
'नागपूर के जेवर ले लो' 'लखनऊ के लो नौलख हार',
यों परदे की इज़्ज़त पर—
देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीलीनेरण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो
सोयी ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगायी थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आयी थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छायी थीं,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचायी थी,
जबलपूर, कोल्हापुर में भी
कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आये काम
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अजीमुल्ला सरनाम,
अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती
उनकी जो क़ुरबानी थी।
बुंदेले हरबालों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ़्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,
ज़ख्मी होकर वॉकर भागा,
उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
रानी बढ़ी कालपी आयी, कर सौ मील निरंतर पार
घोड़ा थककर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना-तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खायी रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया
ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आयी थी,
अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खायी थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आयी थीं,
युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचायी थी,
पर, पीछे ह्यूरोज़ आ गया,
हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किंतु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी
उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
रानी गयी सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज़ से तेज़, तेज़ की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गयी पथ, सिखा गयी
हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू ही होगी,
तू ख़ुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
किट किट वाढते दोघांत
थड थड वाजते दोघांत
कधी भांडण , कधी बॉक्सिंग
अंतर वाढते दोघांत
किट किट…
असे जरी माया तरी
भाजते अंग रागाने
सोचो तुम्हे पलभर भी
बिजली कडके जोराने
भावनांचे नाटक नको,
जीव अडकला भांडयात
किट किट …
शब्द ही तू , वाक्य ही तू
भांडणाचे कारण ही तू
जख्म भी तू , दवा भी तू
झालेल्या जखमांची पहचान भी तू
रोज नवे भय तुझे ,
वाढते टेन्शन डोक्यात
किट किट ………
परी ग परी स्वप्नात माझ्या तू येशील का
इवले इवले फुलपाखरांचे पंख मला देशील का
काळे काळे ढग पाहून नभात
धुंदावला मोर नाचतो डौलात
मखमली निळा चकाकणारा पिसारा मला देशील का
नभाच्या निळ्या पडद्याआड
सुंदरसे चंदेरी मामाचे घर
हरणांच्या गाडीत चंदामामाच्या घरी मला नेशील का
दूरच्या डोंगरी झरा वाहतो
झुळझुळवाणे गीत तो गातो
तयाच्या मंजुळ गीताची तान कंठात माझ्या भरशील का
टिक टिक वाजते डोक्यात
धड धड वाढते ठोक्यात
कभी जमीन कधी नभी
संपते अंतर झोक्यात......
नाही जरी सरी तरी
भिजते अंग पाण्याने
सोचू तुम्हे पलभर भी
बरसे सावन जोमाने
शिम्पल्याचे शो पीस नको
जीव अडकला मोत्यात......
सूरही तू तालहि तू
रुठे जो चांद वो नूर हे तू
आसू हि तू हसू हि तू
ओढ मनाची नि हुरहूर तू
रोज नवे भास तुझे
वाढते अंतर श्वासात......
टिक टिक वाजते … डोक्यात
धड धड वाढते ठोक्यात.......
हा पाऊस असतो -
आपल्या आगमनाची आतुरतेनं वाट पाहायला लावणारा ,
सळसळणारा वारा , विजांचा लखलखाट आणि मेघांचा गडगडाट,
वातावरणात एक सुखद गारवा , वेगळीच धुंदी घेऊन येणारा ,
सर्वांनाच वेडावणारा , सुखावणारा ,
सगळीकडे नवचैतन्याची उधळण करणारा ,
आपल्या टपोऱ्या थेंबांनी पानांवर दवाबिंदुंच्या मोत्यांची पखरण करणारा ,
व्यवहाराची गणितं न मानणारा ,
सगळ्या चौकटी मोडून मुक्तपणे बरसणारा ,
वेळकाळाचं कुठलंही बंधन न जुमानता मनसोक्त बागडणारा ,
कधी उग्र , विराट तर कधी सौम्य रूपाचं दर्शन घडवणारा ,
आपल्या जवळचं सर्व संचित मुक्तपणे उधळणारा ,
कधीकधी मनाला अनामिक हुरहूर लावणारा ,
बरसणाऱ्या प्रत्येक थेंबागणिक मनात वेगळेच विचार , आठवणी , स्वप्नं जागवणारा ,
आपल्या आयुष्याशी एक वेगळंच नातं जोडणारा ,
असताना अथवा नसतानाही आपलं आयुष्य मात्र व्यापून टाकणारा ..
हे सगळं लिहितांनाच आठवांचा पाऊस मात्र डोळ्यांत कधी साचला हे कळलंदेखील नाही.
या पावसाची हि अशीही एक वेगळीच अनुभूती …..
आज-काल मला जुन्या आठवणी फार फार सतावतात
शाळेतल्या-कॉलेजमधल्या सगळ्या सगळ्या गोष्टी आठवतात
सध्या काम कमी अन् वेळ भरपूर
कंटाळा आलाय आता नेट सर्फिंग करून
काय करणार सध्या बेंच वर आहे
कारण शेवटी मी एक प्रोफेशनल आहे
दिवसातले किमान 10 तास मी कंपनी मध्ये घालवतो
कंपनीच्या पैश्याचे A\C, नेट अन् टेलिफोन्स वापरतो
चार-चार वेळा कॉफी प्यायची सवय लागली आहे मला पण माझ्या
कॉलेज canteenच्या कटींगची सर नाही त्याला
कंपनीतले बेचव जेवण गोड मानून घेतो आहे
कारण शेवटी मी एक प्रोफेशनल आहे
कट्ट्यावरच्या गप्पा तर कधीच मागे पडल्या
A\C Conference rooms मध्ये आता मीटिंग्स होऊ लागल्या
टीम-मेटसच्या गर्दीत माझ्या मित्रांची टोळी हरवली
पक्या, अज्या, रघूची जागा आता मूर्थी, कृष्णन आणि रेवतीने घेतली
ODCमध्ये एकतरी मराठी माणूस शोधतो आहे
कारण शेवटी मी एक प्रोफेशनल आहे
सुरुवातीला खूप फोन SMS व्हायचे
कोण कुठे काय करतोय लगोलग कळायचे
आजकाल जो-तो projectमध्ये बिझी ज़ालाय
भुला भटका missed call आता महाग झालाय
forwards आणि chain mails मध्ये खुषालीची मैल शोधतो आहे
कारण शेवटी मी एक प्रोफेशनल आहे
दर वीकएण्डसला मे मल्टीप्लेक्स मध्ये जातो
दीड-दमडीच्या मुव्हीसाठी शे-दीडशे मोजतो
सेलेब्रेशन्स,पार्टीज साठी pizza hut चा रस्ता गाठतो
veggie crust, pepperoni कसले कसले फ्लेवर्स मागवतो
पण pocket moneyसाठवून केलेल्या partyची मजा ह्यात शोधत आहे
कारण शेवटी मी एक प्रोफेशनल आहे
रोजचा शिरस्ता म्हणून घरी एक फोन लावतो
एकुलता-एक असण्याचे आपले कर्तव्य पार पाडतो
"आता कधी येशील?" असे आई रोज विचारते
बाबांच्याही आवाजात हल्ली खूप चिंता जाणवते
करियर आणि आई-बाबांपैकी मे माझ्या करियरला निवडले आहे
कारण शेवटी मी एक प्रोफेशनल आहे
खरच सारे काही गेलेय आता बदलून
एका टॅग ने ठेवलाय माझे आयुष्य जखडून
कधीतरी तो दिवस येईल
office मधून थेट मी माझ्या घरी जाईन
पण मला माहितेय हे एक स्वप्न आहेकारण शेवटी मी एक प्रोफेशनल आहे
Beautiful song with Income Tax Lyrics मैं और मेरी कमाई, अक्सर ये बातें करते हैं, टैक्स न लगता तो कैसा होता.? तुम न यहाँ से कटती, न तुम वह...